बहू की रीढ़ की हड्डी है सासु
बहू की रीढ़ की हड्डी है सासु ---------------------------------- मेरी तो किस्मत खराब है। सोंचा था एक बढ़िया सासु होगी। जो मेरे सुख दुःख में होगी। पति अपनी माँ से ज्यादा मुझे चाहने वाला होगा। पर इस सासु को देख कर मेरा माथा खनकता रहता है। बिन सासु का जीवन कितना प्यारा होता है। तनाव फ्री। आजादी की लहर होती है। जिन्दादिली होती है। सुबह से शाम तक कांव-कांव लगाये रहती हैं। जैसे मैं कुछ जानती ही नहीं। बहू ऐसाकर लो। वैसा कर लो। ऐसा मत करो। मेरी माँ ने जीभर सिखाया है। हर काम कर लेती हूँ। पता नहीं कब मरेगी। यह बुढ़िया जी की जंजाल है। मेरे ही पल्ले पड़ना था। आजकल मैं कमजोर हो गयी हूँ। इसी सासु का टेंशन है। होंठ सूख गये हैं। चेहरे की रौनक चली गयी है। कमजोरी महसूस हो रही है। किससे कहूँ यह व्यथा। यह सब बहू के ख्यालात है। बेटे की शादी से पहले माँ ने ही कहा था। आंगन बन जाता तो बहू घर में रहती। बहू घर की इज्जत होती है। आंगन बन गया। शौचालय की जिद माँ ने ही कहा था। बन जाता तो ठीक रहेगा। बहू का बाहर जाना ठीक नहीं है। जमाना बदल गया है। हम बेटी भले बाहर जाती हैं लेकिन बहू के लिए शौचालय घर की मान म...