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दो गधे और समझदार खच्चर..

 दो गधे और समझदार खच्चर (बाल-कहानी) ... एक जंगल में दो गधे रहते थे - काला गधा और भूरा गधा। दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे, लेकिन एक दिन घास के लिए झगड़ा हो गया। "ये हरी घास मेरी है!" चिल्लाया काला गधा। "नहीं, मेरी!" बोला भूरा गधा।तू-तू मैं-मैं से बात बढ़ी और दोनों आपस में लड़े। काला गधा दांत से काटा, भूरा गधा पैर से लात मारी। काला का एक दांत टूट गया, भूरा का पैर मोच खा गया। जंगल में हंगामा मच गया! तभी दूर से खच्चर महोदय आए। वे बहुत समझदार थे। उन्होंने चिल्लाया, "अरे भाइयों, रुको! मारपीट से क्या मिलेगा? आओ, घास को बांट लो।" दोनों गधों ने सांस ली और खच्चर की बात मानी। उन्होंने घास आधी-आधी बांट ली। अब वे फिर दोस्त बन गए और हंसते-खेलते खुश रहने लगे। जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज

जयचन्द प्रजापति की व्यंग्य शैली

 जयचन्द प्रजापति की व्यंग्य शैली सामाजिक विडंबनाओं, आधुनिक जीवन की विसंगतियों और आम जन के जीवन के यथार्थ का रचनात्मक और अत्यंत व्यंग्यपूर्ण चित्रण करती है। उनकी रचनाओं में स्थानीय भाषा, सहज संवाद और आमफहम मुद्दों को केंद्र में रखते हुए गहरा कटाक्ष मिलता है। प्रमुख विशेषताएँसीधा संवाद और व्यंग्यबोध जयचन्द प्रजापति की शैली में आम बोलचाल का सहज प्रयोग होता है, जिससे उनके व्यंग्यों में संप्रेषणीयता और प्रासंगिकता बढ़ जाती है। विषय चाहे सोशल मीडिया की बनावट हो या समाज की विसंगतियाँ — उनकी भाषा में कटाक्ष, चुटीला हास्य और स्थानीय स्लैंग का जमकर प्रयोग मिलता है। आधुनिक सामाजिक विषय-वस्तु उनके व्यंग्य समकालीन जीवन और समाज की खूबियों-खामियों पर गहरा व्यंग्य करते हैं। प्रसंग चाहे फेसबुकिया ‘अंधभक्त’ हों या बदलती पारिवारिक संरचना — वे अपने व्यंग्य में नए विषयों पर रचनात्मक दृष्टि डालते हैं। ।मानवीय संवेदना और करुणा उनके व्यंग्य में करुणा और सहानुभूति के भाव, श्रमिकों, रिक्शाचालकों, स्त्रियों और आम आदमी की समस्याओं को लेकर मौजूद रहते हैं, जिससे हास्य के साथ गंभीर सामाजिक संदेश भी संप्रेषित होत...

हिन्दी की समर्पित कवयित्री.. हास्य व्ंठ

 हिन्दी की समर्पित कवयित्री... हास्य व्यंग्य ...... एक दिन मैं कोई लेख लिखा था। उस लेख में एक अंग्रेजी शब्द आ गया। शुध्द हिंदी कवयित्री का मौन टूट गया क्योंकि हिन्दी उनके रग-रग में दौड़ रही थी। कई सालों से इकट्ठा ह्रदय में विष की प्याला उगल दी। बोली मैं आपको अमित्र कर रही हूं क्योंकि आपने एक अंग्रेजी शब्द का प्रयोग किया है। ऐसी विचारधारा को सुनकर मेरे हिन्दी लेखक होने का गुरूर टूट गया। मैं उस हिन्दी की देवी के सामने नतमस्तक हो गया। उस महान कवयित्री के प्रति समर्पित पाठक की तरह हो गया। ऐसी कवयित्री इस लोक में मिलना दुर्लभ है। जिसको मिल गयी हैं समझियों करोड़ो देवी-देवताओं का दर्शन मिल गया है। अमित्र करने का शब्द सुनकर गला सूख गया। फ्रीज का पानी चार गिलास पीना पड़ा। विनम्र भाव से आग्रह किया कि ऐसा मत करिये। हम अनाथ हो जायेंगें क्योंकि हिन्दी कि आप मर्मज्ञा हैं। मैंने क्षमा मांगा कि अब अंग्रेजी शब्द कभी नहीं लिखूंगा। यदि अंग्रेजी शब्द आने की संभावना होगी तो वह लेख निरस्त कर दिया जायेगा।  कुछ शंका हुई तो पूछ लिया कि आपका नाम फेसबुक पर अंग्रेजी में है। हस्ताक्षर अंग्रेजी में करती है...
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वकील साहब का सच वकील साहब बहुत सरल स्वभाव के दिखे। चेहरे पर एक चमक, एक विशाल व्यक्तित्व के स्वामी दिखे। ईमानदारी उनकी जैसे जेब में है। सादगी के प्रतीक लग रहे थे। कानून के ज्ञाता, कोई कानून में पराजित नहीं कर सकता। गरीबों को कानूनी सहायता करने वाले दिखे।  मोटी फीस न जमा करने के कारण मुरारी का केस लड़ने से मना कर दिया। जो कुछ मुरारी ने पैसे की व्यवस्था की थी उसने पत्नी के गहने बेंचे थे। जैसा वकील साहब दिखे वैसा सच में मुरारी के गिड़गिड़ाने पर पिघले नहीं।                             ......जयचन्द प्रजापति जय                                    प्रयागराज
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आदिवासी बच्चियां ---------- ठंड में भी कम वस्त्र में आदिवासी बच्चियां टहनियां बीन लाती हैं बगीचे से खाना पकाने के लिये वह ईंधन की व्यवस्था करती है सहती हैं हर मार प्रकृति की फिर भी नहीं टूटती हैं बच्चियां मुश्कराते हुये सुअर चरानें जाती हैं भयंकर ठंड में भी हंसती मिलती हैं ये बच्चियां फटे पतले कपडों में बाग से फल लाते हैं खेतों में गिरे दाने भी वह बीनते नजर आते हैं कभी कभी किसी के घर मिल जाती हैं काम करते कुछ पोटली में लिये हुये मुश्कराते हुये मां के साथ बाल मनुहार करने लगती हैं ये बच्चियां किसी से विवाद नहीं करती हैं किसी की तीखी बातों का हंस के सुन लेती हैं ये प्यारी आदिवासी बच्चियां                       जयचन्द प्रजापति 'जय'                           प्रयागराज                   मो. 7880438226
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आदत है रोज मांगने की .................... बेहद कमजोर, हिलते हाथ, चेहरे की झुर्रियां, कांपती आवाज में एक भिक्षुक ने जाते हुये पति पत्नी को हाथों से इशारा कर कुछ खाने के लिये संकेत करते हुये कुछ खाने की मांग। दयावान पत्नी ने पति को कुछ सहायता करने की बात कही। पति मुश्कराया। इनकी आदत है रोज मांगने की कहकर स्कूटी स्टार्ट की। जल्दी पत्नी को बैठने के लिये कहा। जाते वक्त पत्नी मुड़ कर भिक्षुक को देखती रह गयी जब तक वह भिक्षुक आंखों से ओझल नहीं हो गया।  पत्नी यही सोंचती जा रही थी.. इनकी आदत है रोज मांगने की। पत्नी यह भी सोंच रही थी कि अगर कोई इनका होता तो रोज मांगने की आदत नहीं होती।                            ..... जयचन्द प्रजापति 'जय'                                       प्रयागराज

एक संस्मरण.. जब पत्नी ने यमराज से मुझे बचाया.........जब मै दिल्ली रहता था तो एक बार टीबी रोग से ग्रसित हो गया। बेहद कमजोर हो गया। दुबली शरीर हो गयी, बढती सांस की गति से लग रहा था कि मौत नजदीक है। हड्डी का ढांचा हो गया था। किसी तरह से प्रयागराज एक्सप्रेस पकड़ कर घर पहुंचा। बड़ी भीड़ जमा हो गयी। लोगों ने कानाफूसी की कि इनका बचना लगभग मुश्किल है। कोई चमत्कार ही बचा सकता है।साहित्य तो रगों में बसा था। उस हालात पर भी मैं हौंसला नहीं खोया था। एक भरोसा था कि मैं जरूर ठीक हो जाऊंगा। सलाह दी गयी कि लोगों से कुछ दूर रहें। कुछ औरतें मुझे ऐसे देख रही थी। मेरे अन्तिम यात्रा कि जैसे दर्शन देने के लिये आयी हो। लोगों ने अपने बच्चों को हिदायत दी कि उनके पास न जाये नहीं तो उसे भी यह रोग हो जायेगा।किसी ने कहा कि झाड़ फूंक कराइये। किसी ने टीबी रोग विशेषज्ञ की सलाह लेने के लिये कहा। किसी ने रोज नीम की पत्ती को पानी में उबाल कर नहलाने की बात की। लोग दूर से बात कर रहे थे अब। एक थाली में खाने वाले लोग जैसा व्यवहार वाले भी कन्नी काट लिये। सब लोगों ने सहानुभूति दूर से दिखायी।मेरी बीमारी पर मेरी मां जी बूते मेरी सेवा में लग गयी। पत्नी ने भी प्रतिदिन सेवा का निर्णय लिया। हम अंतिम समय की कल्पना यात्रा में थे कि यमराज के दूत ले जाने की तैयारी कर रहे होंगें। सपने डरावने आने लगे। दवा लेने के बाद दिन भर बेहोशी जैसे हालात बनी थी। दवा दुआ प्रतिदिन चालू हो गयी। कुछ लोगों ने पत्नी और मां को सलाह दी दूर रहने की। यह घातक बीमारी है। चपेट में आ जाओगी तो संसार ही उजड़ जायेगा। सेवा चालू है। रूझान कुछ दिन बाद सकारात्मक आने लगा। शरीर में उर्जा का संचार होने लगा। आंखों की रोशनी बढने लगी। बलगम कुछ कम होने लगा। अपने से उठना बैठना चालू हो गया। यमराज भी कुछ डर गये कि अगर इस व्यक्ति को ले जायेंगें तो साहित्य का आदमी कुछ लिख देगा तो मेरा बखेड़ा हो जायेगा। एक मासूम पत्नी बेवा हो जायेगी। एक मां अनाथ हो जायेगी।एक लेखक कवि को ले जाना उचित नहीं है। बीमार है फिर भी हंस रहा है। उत्साह से भरा है। मौत से भी लड़ना चाहता है। शरीर में दम नहीं है। मुकाबला करने को तैयार है। कितना वीर पुरुष है। मैं इसकी वीरता को सलाम को करता हूं। यमराज अपने कुछ सैनिकों की कटौती कर हटा दिया। मेरे हालत को देखकर धीरे धीरे सारे सैनिकों को हटा लिया गया। अब कुछ तगड़ा होने लगा। मां पत्नी की सेवा रंग लाने लगी।पत्नी को कुछ लोगों ने डराया। दूर रहा करो। टीबी रोगी हो जाओगी। अभी कौन सी उमर है। दूसरी शादी कर लेना। लोगों की बातों को अनसुना कर एक वीरता का चोंगा पहनकर रात दिन सेवा की। सेवा से यमराज जी घबड़ा गये। ये सावित्री से भी तेज है। इसके पति का प्राण लेना उचित नहीं। रात दिन के सेवा से मेरे प्राण पखेरू को यमराज जी ने लेने से इंकार कर दिया अर्थात अब सहीं होने लगा। कुछ साइकिल भी चलाने लगा। खेतों सिवानों में जाने लगा। चेहरे पर लालिमा दौड़ने लगी। अब मैं ठीक होने लगा। धीरे धीरे ठीक हो गया। छः माह तक दवा खाया। ...... जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज

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