वकील साहब का सच वकील साहब बहुत सरल स्वभाव के दिखे। चेहरे पर एक चमक, एक विशाल व्यक्तित्व के स्वामी दिखे। ईमानदारी उनकी जैसे जेब में है। सादगी के प्रतीक लग रहे थे। कानून के ज्ञाता, कोई कानून में पराजित नहीं कर सकता। गरीबों को कानूनी सहायता करने वाले दिखे। मोटी फीस न जमा करने के कारण मुरारी का केस लड़ने से मना कर दिया। जो कुछ मुरारी ने पैसे की व्यवस्था की थी उसने पत्नी के गहने बेंचे थे। जैसा वकील साहब दिखे वैसा सच में मुरारी के गिड़गिड़ाने पर पिघले नहीं। ......जयचन्द प्रजापति जय प्रयागराज
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आदिवासी बच्चियां ---------- ठंड में भी कम वस्त्र में आदिवासी बच्चियां टहनियां बीन लाती हैं बगीचे से खाना पकाने के लिये वह ईंधन की व्यवस्था करती है सहती हैं हर मार प्रकृति की फिर भी नहीं टूटती हैं बच्चियां मुश्कराते हुये सुअर चरानें जाती हैं भयंकर ठंड में भी हंसती मिलती हैं ये बच्चियां फटे पतले कपडों में बाग से फल लाते हैं खेतों में गिरे दाने भी वह बीनते नजर आते हैं कभी कभी किसी के घर मिल जाती हैं काम करते कुछ पोटली में लिये हुये मुश्कराते हुये मां के साथ बाल मनुहार करने लगती हैं ये बच्चियां किसी से विवाद नहीं करती हैं किसी की तीखी बातों का हंस के सुन लेती हैं ये प्यारी आदिवासी बच्चियां जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज मो. 7880438226
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आदत है रोज मांगने की .................... बेहद कमजोर, हिलते हाथ, चेहरे की झुर्रियां, कांपती आवाज में एक भिक्षुक ने जाते हुये पति पत्नी को हाथों से इशारा कर कुछ खाने के लिये संकेत करते हुये कुछ खाने की मांग। दयावान पत्नी ने पति को कुछ सहायता करने की बात कही। पति मुश्कराया। इनकी आदत है रोज मांगने की कहकर स्कूटी स्टार्ट की। जल्दी पत्नी को बैठने के लिये कहा। जाते वक्त पत्नी मुड़ कर भिक्षुक को देखती रह गयी जब तक वह भिक्षुक आंखों से ओझल नहीं हो गया। पत्नी यही सोंचती जा रही थी.. इनकी आदत है रोज मांगने की। पत्नी यह भी सोंच रही थी कि अगर कोई इनका होता तो रोज मांगने की आदत नहीं होती। ..... जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज
एक संस्मरण.. जब पत्नी ने यमराज से मुझे बचाया.........जब मै दिल्ली रहता था तो एक बार टीबी रोग से ग्रसित हो गया। बेहद कमजोर हो गया। दुबली शरीर हो गयी, बढती सांस की गति से लग रहा था कि मौत नजदीक है। हड्डी का ढांचा हो गया था। किसी तरह से प्रयागराज एक्सप्रेस पकड़ कर घर पहुंचा। बड़ी भीड़ जमा हो गयी। लोगों ने कानाफूसी की कि इनका बचना लगभग मुश्किल है। कोई चमत्कार ही बचा सकता है।साहित्य तो रगों में बसा था। उस हालात पर भी मैं हौंसला नहीं खोया था। एक भरोसा था कि मैं जरूर ठीक हो जाऊंगा। सलाह दी गयी कि लोगों से कुछ दूर रहें। कुछ औरतें मुझे ऐसे देख रही थी। मेरे अन्तिम यात्रा कि जैसे दर्शन देने के लिये आयी हो। लोगों ने अपने बच्चों को हिदायत दी कि उनके पास न जाये नहीं तो उसे भी यह रोग हो जायेगा।किसी ने कहा कि झाड़ फूंक कराइये। किसी ने टीबी रोग विशेषज्ञ की सलाह लेने के लिये कहा। किसी ने रोज नीम की पत्ती को पानी में उबाल कर नहलाने की बात की। लोग दूर से बात कर रहे थे अब। एक थाली में खाने वाले लोग जैसा व्यवहार वाले भी कन्नी काट लिये। सब लोगों ने सहानुभूति दूर से दिखायी।मेरी बीमारी पर मेरी मां जी बूते मेरी सेवा में लग गयी। पत्नी ने भी प्रतिदिन सेवा का निर्णय लिया। हम अंतिम समय की कल्पना यात्रा में थे कि यमराज के दूत ले जाने की तैयारी कर रहे होंगें। सपने डरावने आने लगे। दवा लेने के बाद दिन भर बेहोशी जैसे हालात बनी थी। दवा दुआ प्रतिदिन चालू हो गयी। कुछ लोगों ने पत्नी और मां को सलाह दी दूर रहने की। यह घातक बीमारी है। चपेट में आ जाओगी तो संसार ही उजड़ जायेगा। सेवा चालू है। रूझान कुछ दिन बाद सकारात्मक आने लगा। शरीर में उर्जा का संचार होने लगा। आंखों की रोशनी बढने लगी। बलगम कुछ कम होने लगा। अपने से उठना बैठना चालू हो गया। यमराज भी कुछ डर गये कि अगर इस व्यक्ति को ले जायेंगें तो साहित्य का आदमी कुछ लिख देगा तो मेरा बखेड़ा हो जायेगा। एक मासूम पत्नी बेवा हो जायेगी। एक मां अनाथ हो जायेगी।एक लेखक कवि को ले जाना उचित नहीं है। बीमार है फिर भी हंस रहा है। उत्साह से भरा है। मौत से भी लड़ना चाहता है। शरीर में दम नहीं है। मुकाबला करने को तैयार है। कितना वीर पुरुष है। मैं इसकी वीरता को सलाम को करता हूं। यमराज अपने कुछ सैनिकों की कटौती कर हटा दिया। मेरे हालत को देखकर धीरे धीरे सारे सैनिकों को हटा लिया गया। अब कुछ तगड़ा होने लगा। मां पत्नी की सेवा रंग लाने लगी।पत्नी को कुछ लोगों ने डराया। दूर रहा करो। टीबी रोगी हो जाओगी। अभी कौन सी उमर है। दूसरी शादी कर लेना। लोगों की बातों को अनसुना कर एक वीरता का चोंगा पहनकर रात दिन सेवा की। सेवा से यमराज जी घबड़ा गये। ये सावित्री से भी तेज है। इसके पति का प्राण लेना उचित नहीं। रात दिन के सेवा से मेरे प्राण पखेरू को यमराज जी ने लेने से इंकार कर दिया अर्थात अब सहीं होने लगा। कुछ साइकिल भी चलाने लगा। खेतों सिवानों में जाने लगा। चेहरे पर लालिमा दौड़ने लगी। अब मैं ठीक होने लगा। धीरे धीरे ठीक हो गया। छः माह तक दवा खाया। ...... जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज
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