आदिवासी बच्चियां
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ठंड में भी कम वस्त्र में
आदिवासी बच्चियां
टहनियां बीन लाती हैं बगीचे से
खाना पकाने के लिये
वह ईंधन की व्यवस्था करती है
सहती हैं हर मार प्रकृति की
फिर भी नहीं टूटती हैं बच्चियां
मुश्कराते हुये
सुअर चरानें जाती हैं
भयंकर ठंड में भी
हंसती मिलती हैं ये बच्चियां
फटे पतले कपडों में
बाग से फल लाते हैं
खेतों में गिरे दाने भी
वह बीनते नजर आते हैं
कभी कभी किसी के घर
मिल जाती हैं काम करते
कुछ पोटली में लिये हुये
मुश्कराते हुये
मां के साथ बाल मनुहार करने लगती हैं
ये बच्चियां किसी से विवाद नहीं करती हैं
किसी की तीखी बातों का
हंस के सुन लेती हैं
ये प्यारी आदिवासी बच्चियां
जयचन्द प्रजापति 'जय'
प्रयागराज
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