पप्पू की दुलहिन ( हास्य रचना)

 

पप्पू की दुलहिन (हास्य रचना) 
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पप्पू की दुलहिन बीए पास है। सौन्दर्य की देवी है। रूप की रानी है। जब से पप्पू की दुलहिन आयी है। मोहल्ले में रौनक है। युवाओं में जोश है। उत्सव जैसा माहौल । चार छ: युवक पप्पू के घर बैठे मिल जायेगें। हंसी मजाक का ठहाका।

दूलहिन अच्छी लाये पप्पू। लोगों को लुगाई मिले तो पप्पू की लुगाई की तरह। भाभी चाय तो लाओ। भाभी चाय ला दी। गजब की हो भाभी । आप सौ में एक हैं। पप्पू छांट कर तुमका लाये हैं। ई तुम्हार जो मुश्कान है। सैकड़ो में फबती हो। रमुआ जबसे पप्पुआ की दुलहिन देखा है। नींद ही नहीं आ रही है। पूरा दिन पप्पुआ के घर रहता है। लाई चना खाकर दिन भर खटिया पर पड़ा है। निहारता रहेगा पप्पुआ की दुलहिन को। 

गाँव के बुड्ढे बुढ़ियों में चर्चा है। पप्पुआ की दुलहिन जब से आई है गाँव के सब लौंडे उसके दिवाने हो गये हैं। दिन भर लिपिस्टिक लगाकर लड़कों से बतियायेगी। गोरी चिकनी है। रहुला उसी के चक्कर में स्कूल जाना बंद कर दिया है। कुछ औरतों ने पप्पू को समझाया कहा अपनी दुलहिन को समझा लो। नहीं तो किसी दिन नाक कट जायेगी। दुलहिन को संभाल कर रखा जाता है। पप्पुआ को समझ नहीं आ रहा है। जवानी फिसल गयी तो का किया जा सकता है।

तीन बच्चों की माँ भाग ही गयी। आज तक कोई खबर न मिली। सब मिलके अपने अपने लड़को को बचाओ नहीं तो इस कलमुही की नजर सब लड़कन के बर्बाद कर देगी। कमर हिला कर चलती है। जवानी में आग लगे उस बेवफा कहीं की। पप्पुआ का सुंदर नहीं है। जवान है। पूरा छ: फीट का। का कमी है। कमाता खाता है। देख पप्पू की दूलहिन तू संभलकर रह। तुम्हारे चक्कर में सब लड़का लोग बर्बाद होई जईहैं।


                         ---जयचंद प्रजापति, प्रयागराज

                      

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