जयचंद प्रजापति की कहानी

 निष्ठुर डाक्टर

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रनिया के इकलौते लड़के की तबियत बहुत खराब है। बचने की कोई उम्मीद नहीं। बचने की उम्मीद किया जाये तो घर में एक पाई नहीं है। बेहद गंभीर हालत में लड़का। 


रनिया का आदमी लोगों के वहाँ यहाँ दौड़ दौड़ कर गया। किसी ने नहीं दिया एक पैसा। मेरा बच्चा मर जायेगा। हम अनाथ हो जायेंगे। इकलौता है। मेरे हृदय का लाल। बाबू बड़ी कृपा होगी। नहीं दूंगा पैसा तो मेरा जमीन जायदाद सब हड़प लेना। भिक्षा माँग कर खा लेंगे। 


टस से मस नहीं हुआ वह बाबू। करजा भर नहीं पायेगा। मर जाने दे। तेरी बीबी तो जवान है फिर पैदा कर लेगी। कर्ज से दबा आदमी उभरता नहीं है । जा बाबा घर जा। किस्मत पर सारा खेल छोड़ दे। वहाँ के मिले ताने से और कहीं नहीं गया। सीधे बेटे के पास पहुंचा। बेटे की हालत देखकर। ले भागा हास्पिटल। 


पचास हजार जमा करने पर ही बच्चे की भर्ती होगी। रनिया गिड़गिड़ाई ,डाक्टर साहब हमारे लाला को एक बार देख लीजिए, जीवनभर गुलामी करूँगी। रनिया का आदमी पैर पकड़ कर डाक्टर साहब से विनती की। जल्द ही दे दूंगा। 

बच्चे को एक निगाह से देख लीजिए। बच्चा बच जायेगा। इकलौता लाल। हाथ से निकल जायेगा। 


पैसा आज इंसानियत को चाट रही थी। चिल्लाता रहा। डाक्टर का हृदय निष्ठुर हो गया था। करूणा का सागर सूख गया था। डाक्टर का बिल्कुल मन नहीं पिघला। डाक्टर भगवान का रुप होता है। पैसा ने ज्ञान कला का कत्ल कर दिया। थोड़ा सा देख लेते तो क्या घाटे का सौदा हो जाता। यहाँ पैसा जीत गया। मानवता का गला रेत दिया गया। 


आखिर बच्चा नहीं बचा। दहाड़े मार कर माँ गिर पड़ी। डाक्टर वहाँ से सरक लिया। बाप बेसुध। आंखे फाड़ कर बच्चे को देखता रह गया। मार डाला कमीनों ने। मेरे लल्ला को हमसे छीन लिया। माँ बच्चे को बार बार "आंखे खोल बेटा' कह कर बार-बार बेसुध होती रही। 


ह्रदयविदारक दृश्य। रूदन वेदना का क्षण। सब खामोश हो गया। खामोश हो गया आसमान। निर्दयी हो गया क्षण। सब तार- तार हो गया। इस पैसे की मंडी में पैसे की खातिर निष्ठुर हो गया डाक्टर। निष्ठुर डाक्टर की निष्ठुरता के कारण एक मासूम काल के गाल में समा गया। माँ - बाप को मिला जीवन भर के लिए जख्म-- -- --


                   ----------जयचन्द प्रजापति

                                प्रयागराज

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