जयचन्द प्रजापति "जय' की कहानी

 मेरा प्रथम प्रेम पत्र

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         मैं बिहार का हूँ। मेरा नाम मनोहर जोशी है। प्रेम प्रसंग से सदैव दूर रहा हूँ। प्रेम की भावना कभी नहीं जगी। इस कारण पढा़ई मेरी ठीक ठाक रही। को-एजूकेेशन से दूर रहा। जब जवानी के पड़ाव में आया। हृदय में भावना उमड़ने घुमड़ने लगी। सुंदरता की तरफ आकर्षण बढ़ने लगा। स्त्री के प्रति प्रस्फुटन होने लगा। अब मैं गौर से स्त्रियों को निहारने लगा। उनके घुंघराले बालों को देखकर मन मचलने लगता। उनकी तिरछी चितवन से मन गदगद होने लगा। पड़ोसी मोहनलाल की श्रीमती कुछ मेरे लिए सही लगी। मैं सुना था प्रेम पत्र में बड़ी ताकत होती है। स्त्री चारो खाने चित हो जाती है। इस तरह से किया गया सच्चा प्रेम होता है। इसमें सच्ची तड़प होती है। मैंने प्रेम पत्र लिखने का मन बना लिया। 

      प्रेम पत्र लिखने के लिए हिम्मत चाहिए। साहसी गुण का होना अनिवार्य तत्व है। पत्र की शुरुआत कैसे की जाय। यही सोंचने में दो दिन निकल गए। मन बहुत गिरा था। चेहरे की रौनक गायब थी। पत्र पर कहीं गलत प्रतिक्रिया आ गयी तो संभलना मुश्किल होगा। इसलिए बहुत सोंच समझकर पत्र की शुरूआत की गई। प्रिय प्राणेश्वरी नाम का संबोधन। यह शब्द लिखते ही लगा कामयाब रहूँगा।मन कड़ा किया। उसकी हर चीज की तारीफ लिखूँगा। कोर कसर नही ं छोड़ूँगा। चाहे मेरे उपर लाठी डंडे ही पड़े लेकिन मन की बात आज उतार कर रख दूंगा। पत्र इस तरह से लिखा गया-


प्रिय प्राणेश्वरी

        बहुत मुश्किल घड़ी से गुजर कर यह रसिक प्रेम पत्र लिख रहा हूँ। आप बहुत ही उदार हृदय की महिला है ं। आप में सुन्दरता बेमिसाल है। नयन के तीखे वार से हृदय पर वज्रपात गिरने के समान है। आपके लाल कपोल अति आकर्षित करने की चीज है। हजारों बार चूम लेने की उत्कंठा बनी रहेगी। आपकी मुश्कान पर पूर्ण रुप से मैं विहृवलित हो जाता हूँ। आप एक उपकारी महिला की तरह है ं। आपके उपकार की आशा करता हूँ। नीली साड़ी में आप परी सी दिखती है। आपके लाल होंठ भूल भी नहीं सकता हूँ। आपकी लहराती लट,संपूर्ण मनोभावों को न्यौछावर करने की इच्छा जागृति हो जाती है। आप पतिव्रता नारी हैं लेकिन मेरे इस प्रेम पत्र को खुलेमन से स्वागत जरूर करेंगी। मेरा हृदय नहीं तोड़ेगी तो आपका  आभारी रहूंगा। 


                                                     -- आपका प्रियतम

                                                         मनोहर जोशी


        इस पत्र को कैसे भेजा जाय। मेरी हिम्मत गवाही नहीं दे रहा था। एक बार सोंचा कि इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया जाय। फिर हिम्मत कसा। इसके लिए मैं एक छोटे बच्चे का सहारा लेकर प्रेम पत्र को लिफाफे में भर भेज दिया। मेरा हृदय सुस्त हो गया। क्या प्रतिक्रिया होगी। पति को तो नहीं बता देगी। मामले को लेकर मै बहुत गंभीर गया। दो दिनु बीत गये। मेरे प्रेम पाती का उत्तर नहीं दी। लगता है भूल गयी होगी। तिसरे दिन उसके पति का संदेश आया मिलने को। क्या अपने पति को बता दिया है। अब क्या होगा। डरे हुए सहमें हुए मिलने के लिए गया। मुझे बैठाया। चाय दिया। हाल समाचार पूछा। कुछ देर बात करने के बाद छोड़ दिया। उसने उस पत्र को आलमारी में रख दिया था। संयोग से वह पत्र उसके पति के हाथ लग गया। उस प्रेम पत्र को पढ़ कर आग बबूला हो गया। मुझे वह घर पर बुलाया। आते ही मेरे उपर डंडा लेकर टूट पड़ा। पत्र लिखता है--- मेरी पत्नी ही मिली। जमकर मारा। मेरा एक हाथ टूट गया। सिर में चोट आयी। जानवरो की तरह पीटा। असहनीय दर्द। बड़ी भीड़ जमा हो गयी। किसी तरह लोगों ने बचाकर हास्पिटल में भर्ती कराया। ठीक होकर घर आ गया। आज तक कोई प्रेम पत्र नहीं लिखने हिम्मत जुटा पाया। 


                    ----- जयचंद प्रजापति

                          प्रयागराज

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