जयचन्द प्रजापति "जय' की कविता

मैं भागकर
शादी कर ली
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मैं भागकर
शादी कर ली
कोई गुनाह नहीं की

माँ बाप 
कमा पाते थे
रात को इतना
खाना मिलता था

बिना पेट भरे
पानी पीकर
भर जाती थी पेट

देखा नहीं जा रहा था
माँ बाप की परेशानियां

शादी कर ली
भागकर
माँ बाप का बोझ
कम कर दी

उस लड़के ने कहा
शादी करलो
माँ बाप का बोझ
मैं उठा लूंगा

गरीबी में
तुमने
अन्त:वस्त्र 
कभी न खरीद सकी

फटे वस्त्रों में
तुम्हारा रुप
धूमिल सा हो गया है

मैंने भागकर
इसलिए शादी कर ली
कोई गुनाह नहीं की

दो वक्त की रोटी
नसीब कर ली
माँ बाप का बोझ कम कर दी

समाज की गंदी निगाहें
अब घूरेगी नहीं

------कवि जयचंद प्रजापति 
           प्रयागराज

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