जयचन्द प्रजापति "जय' की कहानी
ममता का दुख
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शादी के कई साल हो गये लेकिन ममता की गोंद सुनी की सुनी रह गयी। कोई औलाद नहीं हुई। ममता फूट फूट कर कभी रोने लगती है। ईश्वर को नहीं मंजूर है कि ममता को ममता दिखाने का। आखिर शीला को सात औलाद देने की क्या जरूरत थी। एक औलाद हमारे कोख में मालिक दे देते तो क्या उनका खजाना खाली हो जाता। जब सुनती किसी को औलाद हुईं है तो हृदय बैठ जाता। वेदना की हूक उठने लगती। अश्रु प्रवाह तीव्र हो जाता। अस्त व्यस्त हो जाती। निवाला छूट जाता। हर स्त्री को मां बनने का सपना होता है। ममता बेचारी भी माँ बनने की आकांक्षा हृदय तल में संजोये है विधना उसके भाग्य में औलाद सुख नहीं लिखा है।
कोई औलाद न होने पर ताना मारा जाने लगा कि यह बाझिन है। सुबह इसका मुंह देखकर उठने से पूरा दिन खराब हो जाता है। तरह तरह की बातें सुनकर ममता बेचारी का दुख और बढ़ जाता । जीवन सूना साना सा हो गया है। बहुत दवा कराया। बहुत पैसा खर्च किया गया । सब ढाक के तीन पात। औलाद जीवन के अन्तिम समय की जरूरत है इसलिए औलाद लोग पैदा करते हैं। ममता की ढलती अवस्था से समझ रही है कि अब तो औलाद का सुख संभव नहीं है। मातृ सुख के लिए ममता ने कई मन्नते माना। सारे देवी देवताओं की स्तुति की। कोई सुनवाई नहीं हुई।
किसी ने सलाह दी कि किसी बच्चे को गोद ले ले। परिवार के अन्य लोग इस बात से सहमत नहीं हैं। अपना पूत अपना होता है। समाज किसी दूसरे को लेने पर स्वीकृति नहीं देगा
ममता जब भी किसी के बच्चे को देखती है तो उसके साथ जीभर कर खेलती है। मातृत्व छलकाने का पूरा प्रयास करती है। कुछ लोग अपने बच्चे को ममता के पास नहीं जाने देते है । उनका मानना है कि जिसको कोई पूत नहो होता है। किसी दूसरे के पूत देखकर उसके अंदर जलन होती है। कहीं उसके बच्चे की हत्या न कर दे।
ममता को इस बात का दुख है कि एक तो कोई औलाद नहीं है उपर से लोगों के ताने सुनकर मन अत्यंत दुखी रहता है कि इस बाझिन का मुंह देखना पाप है। बार बार ताने सुनकर बेचारी फफक फफक कर रोने लगती है। कल्लो ही ममता के दुख सुख में साथ रहती है। कल्लो अपनी एक औलाद भी ममता को देने को तैयार है। कल्लो निम्न जाति की है। कल्लो की औलाद को समाज स्वीकार नहीं करेगा। यही सोचकर ममता ठहर सी जाती है। कल्लो के इस स्नेह दुलार से ममता को ढाढस मिल जाता है लेकिन बिन औलाद के ममता का दुख जस का तस है।
-------जयचंद प्रजापति 'जय'
प्रयागराज
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