एक जयचन्द प्रजापति जय' का संस्मरण

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पत्रकारिका का शौक, बन गये संपादक

पत्रकारिता का शौक मुझे बचपन से रहा। इस सपने को पूरा करने के लिए हमने पत्रकारिता का कोर्स करने के लिए खाते में रखे पांच हजार रुपये निकाल लिया और पत्रकारिता करने के लिए एडमिशन ले लिया । एक बार मन हिचक रहा था कि सारा पैसा खाते से निकाल लिया अब खाता भी बंद हो जायेगा। नाहक एडमिशन ले लिया। 

लेकिन सपने है तो सपनों में जान डालनी पड़ती है। हिम्मत को टूटने नहीं दिया। हिम्मतें मर्दा तो मद्दत्ते खुदा। कुछ लोग कहे कि बड़का पत्रकार बनेगा। ईश्वर का नाम लेकर इस जंग में कूद पड़ा। किसी तरह कोर्स पूरा किया। सोंचा खाली बैठे हैं तो कुछ आगे को सोंचा जाय। एक अखबार चलाने का मूड बन गया। आव देखा न ताव। कर दिया आवेदन। 

भाग दौड़ के बाद एक समाचार पत्र का प्रकाशन के लिए आरएनआई नंबर मिल गया। बन गया एक अखबार का मालिक।'हंडिया खास' समाचार पत्र का जिम्मा अपने सिर पर ले लिया। बहुत ही सुखद अनुभूति हुई। मेहनत रंग लाई। 

अगर सचमुच आदमी कुछ भी ठान ले तो और कुछ करने का जज्बा है तो फूल खिला कर ही दम लेगा। कुछ काम कठिन हो सकते हैं लेकिन असंभव नहीं है। कुछ साल तक हम अपने आपको कीचड़ समझने लगे थे इसलिए कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा लेकिन कीचड़ में ही कमल खिलता है। कमल खिलता है तो खुशबू बिखेर ही देता है। 

                            ------- जयचन्द प्रजापति "जय'
                                            प्रयागराज

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