हास्य व्यंग्य--------------चमचा की चमचई.................... व्यंग्यकार जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज

हास्य व्यंग्य
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चमचा की चमचई
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हम लेखकीय करते हैं। एक दिन हम जा रहे थे पैदल ही तो रास्ते मे सफेद कुर्ता पायजामा में एक चमचा मिल गया। हमसे बोला कि हम राष्ट्रीय टाइप के चमचा हैं। हम कुछ सहयोग के उद्देश्य से सुबह सुबह मिलने चल दिए आप से। हम चमचा देखा।ऊपर नीचे तक देखा। भारी भरकम शरीर।गोरा टाइप का।बाल में डाई लगा रखा था। स्माइल गजब की रही।

तो बताओ चमचा भाई क्या मदद कर सकता हूं। हमको कसाई कि तरह उपर नीचे तक देखा।बोला..तो आप कवि लेखक हैं। हमने कहा कोई दिक्कत है क्या चमचा बाबू। नही दिक्कत नही है। किस पार्टी से हैं। हम किसी पार्टी से नही हैं। हम तो सरक लेते हैं कोई मोटा रकम दिया। आप मोटे रकम वाले हैं। हां भाई कोई शक नहीं।

हमारी पार्टी की तरफ हो जाओ। पार्टी पर कुछ लेख कविता तारीफ में लिखना है। मालामाल कर दूंगा। चार पीढ़ियां तक मौज करेगी। हमने बात मान ली। चमचा बोला कुछ आओ समोसा चाय हो जाय। हमने कहा ..चमचा भाई। ऊ होटल ठीक रहेगा। हां चलो दबा दबा कर खालो कवि जी।मालामाल कर दूंगा। हम थोड़ा लालची टाइप के। जी हमार खुश हो गया।हमने मन ही मन सोचा। फंस गया चमचा बेचारा।

हम दोनो महंगे होटल में गए।खूब दबा दबा कर एक एक आइटम खाए ।पेट पर हाथ फेरे।सब सामान हम मंगा रहे थे। पैसा चमचा बाबू देगा। पांच हजार का बिल बन गया।चमचा बोला कवि जी बैठे रहिए। पैसा कम है। एटीएम से निकाल कर आते हैं।एक लाख तक आपको एडवांस दे देते हैं। हमने कहा जाओ भाई जल्दी करो।

हम सपने बनाने लगे। एक लाख। बड़ा फायदा है लेखकी में। मजा आ जायेगा। एक लाख एडवांस।ऊपर से जमकर खिलाया पिलाया।मजा आ गया। होटल वाला बोला... बाबूजी पैसा जल्दी से जमा कर दो। एक  घण्टे हो गए। पैसा आ रहा है सब मिल जायेगा। धीरज रखो। दो घंटे बीत गए। तीन घंटे बीत गए। इसी तरह शाम हो गई। पर चमचा दिखा नही। मैं समझ गया चमचा हमसे चमचई कर गया। हाय हमारा एक लाख। हम लूट गए। बर्बाद हो गए।

सब स्टाफ आ गए होटल के। पैसा जमा करो बाबू। बेवकूफ बना रहे हो हमे। पैसा नही जमा करोगे तो एक माह तक होटल में बर्तन मांजना पड़ेगा। मेरे तो पैरो तले जमीन खिसक गई। वीआईपी होटल में आज बर्तन मांज रहा हूं। उस चमचा के कारण एक माह तक मांजना है। अच्छा हुआ चमचा का नेता नही आया नही तो पांच साल तक बर्तन मांजना पड़ता अगले चुनाव तक।

                          व्यंग्यकार जयचन्द प्रजापति 'जय'
                                     प्रयागराज

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