जयचन्द प्रजापति जय' का छ

इलाहाबादियों के रगों में बसें है कवि श्लेष गौतम
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श्लेष गौतम इन दिनों मंचों पर छा गये हैं। जाना पहचाना नाम। इलाहाबाद की माटी का लाल। अपने पिता कैलाश गौतम के नक्शे कदम पर कदम ताल मिलाते हुए पूरे भारत में प्रसिद्धि मिल रही है। बहुत सुन्दर लिखते हैं और वैसे ही झूमकर गा देते हैं तो महफ़िल में चार चांद लग जाता है। इनका एक मुक्तक---

तेरी यादों का मंज़र,आ गया है
इन आंखों में समुंदर,आ गया है
हवाएं भीगी-भीगी,बह रही हैं
पता है फिर,दिसंबर,आ गया है

एक महान साहित्यकार के पुत्र साहित्यिक परिवेश में कह लीजिए कि साहित्यिक गोद में पला पढ़ा यह कवि  इलाहाबाद के रगों में बस गया है। साहित्य को देख और छू कर बड़े हुए हैं श्लेष गौतम जी। ये भी इलाहाबाद के एक धरोहर हैं। सच बोलती इनकी सारी रचनायें एक पिताजी के रचना से मिलती जुलती जनवादी सोंच के साथ गंगा की गोद में पुष्पित तथा पल्लवित हो रही हैं। 

सचमुच इलाहबादियों का एक सौभाग्य है कि इतने महान कवि का सानिध्य मिल रहा है। बहुत ही सहज सोंच के ये बुध्दिजीवी हैं। सरलता सुगमता से लोगों के दिलों में घर कर जातें हैं। यह इनकी महानता का ही एक गुण है। एक हंसमुख चेहरे क्षितिज को पा लेने की एक मिशाल हैं श्लेष भाई गौतम। बहुत ही गुणवत्ता से परिपूर्ण होने का गौरवमयी इतिहास रच रहें हैं। 

हम बहुत पहले सुनते पढ़ते चले आ रहे हैं। पहली बार इनको हमने हाल ही में अल्लापुर में हुये अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में इनका काव्य पाठ सुना था। बहुत ही सुंदर ढंग से रचनाओं की प्रस्तुति करते हैं। मंच को इस तरह से झूमने को मजबूर कर देते हैं कि श्रोताओं के रगों में सिहरन सी दौड़ जाती है। 

मंचों पर एक स्थापित कवि होते जा रहे हैं। पूरे देश में इनका कार्यक्रम हो रहा है। सुर्खियों में हैं। इलाहाबाद का झंडा पूरे मुल्क में लहरा रहे हैं। इनका कद काठी वही है जैसे इनकी रचनायें हैं। इस तरह से एक विस्तृत होता जा रह है इनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व। सच में हर कोई सुनना चाहता है श्लेष भाई गौतम जी को---

              ---- जयचन्द प्रजापति "जय'
                       प्रयागराज

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